॥ श्रीहरिः ॥
सुरर्षे त्वं हि धन्योऽसि मद्भाग्येन समागतः।
साधूनां दर्शनं लोके सर्वसिद्धिकरं परम्॥ ७९
surarṣe tvaṃ hi dhanyo'si madbhāgyena samāgataḥ|
sādhūnāṃ darśanaṃ loke sarvasiddhikaraṃ param|| 79
अर्थ
भक्तिने कहा—देवर्षे! आप धन्य हैं! मेरा बड़ा सौभाग्य था जो आपका समागम हुआ। संसारमें साधुओंका दर्शन ही समस्त सिद्धियोंका परम कारण है॥ ७९॥
सुरर्षे त्वं हि धन्योऽसि मद्भाग्येन समागतः।
साधूनां दर्शनं लोके सर्वसिद्धिकरं परम्॥ ७९
भक्तिने कहा—देवर्षे! आप धन्य हैं! मेरा बड़ा सौभाग्य था जो आपका समागम हुआ। संसारमें साधुओंका दर्शन ही समस्त सिद्धियोंका परम कारण है॥ ७९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण PRE.1.79 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 40) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/mahatmya/padma/1/79/