पुत्रीकृत्य त्वयेमौ च पार्श्वे स्वस्यैव रक्षितौ॥ ११
smṛtā tvayāpi cātraiva muktirāyāti yāti ca|
putrīkṛtya tvayemau ca pārśve svasyaiva rakṣitau|| 11
अर्थ
इस लोकमें भी तुम्हारे स्मरण करनेसे ही वह आती है और फिर चली जाती है; किंतु इन ज्ञान-वैराग्यको तुमने पुत्र मानकर अपने पास ही रख छोड़ा है॥ ११॥
स्मृता त्वयापि चात्रैव मुक्तिरायाति याति च।
पुत्रीकृत्य त्वयेमौ च पार्श्वे स्वस्यैव रक्षितौ॥ ११
इस लोकमें भी तुम्हारे स्मरण करनेसे ही वह आती है और फिर चली जाती है; किंतु इन ज्ञान-वैराग्यको तुमने पुत्र मानकर अपने पास ही रख छोड़ा है॥ ११॥
श्रीमद्भागवत महापुराण PRE.2.11 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 41) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/mahatmya/padma/2/11/