श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक PRE.2.23

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (पद्मपुराण) · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

भक्तिरुवाच

अहो नारद धन्योऽसि प्रीतिस्ते मयि निश्‍चला।

न कदाचिद्विमुञ्चामि चित्ते स्थास्यामि सर्वदा॥ २३

aho nārada dhanyo'si prītiste mayi niścalā|

na kadācidvimuñcāmi citte sthāsyāmi sarvadā|| 23

अर्थ

भक्तिने कहा—नारदजी! आप धन्य हैं। आपकी मुझमें निश्‍चल प्रीति है। मैं सदा आपके हृदयमें रहूँगी, कभी आपको छोड़कर नहीं जाऊँगी॥ २३॥

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