भक्तिने कहा—नारदजी! आप धन्य हैं। आपकी मुझमें निश्चल प्रीति है। मैं सदा आपके हृदयमें रहूँगी, कभी आपको छोड़कर नहीं जाऊँगी॥ २३॥
अहो नारद धन्योऽसि प्रीतिस्ते मयि निश्चला।
न कदाचिद्विमुञ्चामि चित्ते स्थास्यामि सर्वदा॥ २३
भक्तिने कहा—नारदजी! आप धन्य हैं। आपकी मुझमें निश्चल प्रीति है। मैं सदा आपके हृदयमें रहूँगी, कभी आपको छोड़कर नहीं जाऊँगी॥ २३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण PRE.2.23 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 42) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/mahatmya/padma/2/23/