अभीतक भगवान्की प्राप्ति करानेवाला मार्ग तो गुप्त ही रहा है। उसका उपदेश करनेवाला पुरुष प्रायः भाग्यसे ही मिलता है॥ ५७॥✎ 11
वैकुण्ठसाधकः पन्थाः स तु गोप्यो हि वर्तते।
तस्योपदेष्टा पुरुषः प्रायो भाग्येन लभ्यते॥ ५७
अभीतक भगवान्की प्राप्ति करानेवाला मार्ग तो गुप्त ही रहा है। उसका उपदेश करनेवाला पुरुष प्रायः भाग्यसे ही मिलता है॥ ५७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण PRE.2.57 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 45) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/mahatmya/padma/2/57/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)