श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक PRE.2.58

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (पद्मपुराण) · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

सत्कर्म तव निर्दिष्टं व्योमवाचा तु यत्पुरा।

तदुच्यते शृणुष्वाद्य स्थिरचित्तः प्रसन्‍नधीः॥ ५८

satkarma tava nirdiṣṭaṃ vyomavācā tu yatpurā|

taducyate śṛṇuṣvādya sthiracittaḥ prasannadhīḥ|| 58

अर्थ

आपको आकाशवाणीने जिस सत्कर्मका संकेत किया है, उसे हम बतलाते हैं; आप प्रसन्‍न और समाहितचित्त होकर सुनिये॥ ५८॥✎ 11

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #11 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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