श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक PRE.2.69

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (पद्मपुराण) · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

यथा दुग्धे स्थितं सर्पिर्न स्वादायोपकल्पते।

पृथग्भूतं हि तद्गव्यं देवानां रसवर्धनम्॥ ६९

yathā dugdhe sthitaṃ sarpirna svādāyopakalpate|

pṛthagbhūtaṃ hi tadgavyaṃ devānāṃ rasavardhanam|| 69

अर्थ

दूधमें घी रहता ही है, किन्तु उस समय उसका अलग स्वाद नहीं मिलता; वही जब उससे अलग हो जाता है, तब देवताओंके लिये भी स्वादवर्धक हो जाता है॥ ६९॥✎ 1565

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1565 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: श्रीमद्भागवत-पुराण → श्रीमद्भागवतपुराण

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