pṛthagbhūtaṃ hi tadgavyaṃ devānāṃ rasavardhanam|| 69
अर्थ
दूधमें घी रहता ही है, किन्तु उस समय उसका अलग स्वाद नहीं मिलता; वही जब उससे अलग हो जाता है, तब देवताओंके लिये भी स्वादवर्धक हो जाता है॥ ६९॥✎ 1565
यथा दुग्धे स्थितं सर्पिर्न स्वादायोपकल्पते।
पृथग्भूतं हि तद्गव्यं देवानां रसवर्धनम्॥ ६९
दूधमें घी रहता ही है, किन्तु उस समय उसका अलग स्वाद नहीं मिलता; वही जब उससे अलग हो जाता है, तब देवताओंके लिये भी स्वादवर्धक हो जाता है॥ ६९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण PRE.2.69 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 46) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/mahatmya/padma/2/69/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)