जब अनेकों जन्मोंके संचित पुण्यपुंजका उदय होनेसे मनुष्यको सत्संग मिलता है, तब वह उसके अज्ञानजनित मोह और मदरूप अन्धकारका नाश करके विवेक उदय होता है॥ ७६॥✎ 1566
इति श्रीपद्मपुराणे उत्तरखण्डे श्रीमद्भागवतमाहात्म्ये कुमारनारदसंवादो नाम द्वितीयोऽध्यायः॥ २॥
भाग्योदयेन बहुजन्मसमर्जितेन
सत्सङ्गमं च लभते पुरुषो यदा वै।
अज्ञानहेतुकृतमोहमदान्धकार-
नाशं विधाय हि तदोदयते विवेकः॥ ७६
जब अनेकों जन्मोंके संचित पुण्यपुंजका उदय होनेसे मनुष्यको सत्संग मिलता है, तब वह उसके अज्ञानजनित मोह और मदरूप अन्धकारका नाश करके विवेक उदय होता है॥ ७६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण PRE.2.76 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 47) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/mahatmya/padma/2/76/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)