श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक PRE.2.75

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (पद्मपुराण) · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

नारद उवाच

यद्दर्शनं च विनिहन्त्यशुभानि सद्यः

श्रेयस्तनोति भवदुःखदवार्दितानाम्।

निःशेषशेषमुखगीतकथैकपानाः

प्रेमप्रकाशकृतये शरणं गतोऽस्मि॥ ७५

yaddarśanaṃ ca vinihantyaśubhāni sadyaḥ

śreyastanoti bhavaduḥkhadavārditānām|

niḥśeṣaśeṣamukhagītakathaikapānāḥ

premaprakāśakṛtaye śaraṇaṃ gato'smi|| 75

अर्थ

नारदजीने कहा—महानुभावो! आपका दर्शन जीवके सम्पूर्ण पापोंको तत्काल नष्ट कर देता है और जो संसार-दुःखरूप दावानलसे तपे हुए हैं उनपर शीघ्र ही शान्तिकी वर्षा करता है। आप निरन्तर शेषजीके सहस्र मुखोंसे गाये हुए भगवत्कथामृतका ही पान करते रहते हैं। मैं प्रेमलक्षणा भक्तिका प्रकाश करनेके उद्देश्यसे आपकी शरण लेता हूँ॥ ७५॥✎ 1566

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1566 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: अज्ञान-जनित → अज्ञानजनित

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