॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक PRE.3.17
नगादयो ययुस्तत्र देवगन्धर्वदानवाः।
गुरुत्वात्तत्र नायातान्भृगुः सम्बोध्य चानयत्॥ १७
nagādayo yayustatra devagandharvadānavāḥ|
gurutvāttatra nāyātānbhṛguḥ sambodhya cānayat|| 17
अर्थ
गंगा आदि नदियाँ, पुष्कर आदि सरोवर, कुरुक्षेत्र आदि समस्त क्षेत्र, सारी दिशाएँ, दण्डक आदि वन, हिमालय आदि पर्वत तथा देव, गन्धर्व और दानव आदि सभी कथा सुनने चले आये। जो लोग अपने गौरवके कारण नहीं आये, महर्षि भृगु उन्हें समझा-बुझाकर ले आये॥ १६-१७॥