श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक PRE.3.55

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (पद्मपुराण) · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

उद्धव उवाच

त्वं तु यास्यसि गोविन्द भक्तकार्यं विधाय च।

मच्चित्ते महती चिन्ता तां श्रुत्वा सुखमावह॥ ५५

tvaṃ tu yāsyasi govinda bhaktakāryaṃ vidhāya ca|

maccitte mahatī cintā tāṃ śrutvā sukhamāvaha|| 55

अर्थ

उद्धवजी बोले—गोविन्द! अब आप तो अपने भक्तोंका कार्य करके परमधामको पधारना चाहते हैं; किन्तु मेरे मनमें एक बड़ी चिन्ता है। उसे सुनकर आप मुझे शान्त कीजिये॥ ५५॥✎ 12

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #12 शब्दोंके बीचका स्थान: ५५॥अब → ५५॥ अब

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