उद्धवजी बोले—गोविन्द! अब आप तो अपने भक्तोंका कार्य करके परमधामको पधारना चाहते हैं; किन्तु मेरे मनमें एक बड़ी चिन्ता है। उसे सुनकर आप मुझे शान्त कीजिये॥ ५५॥✎ 12
त्वं तु यास्यसि गोविन्द भक्तकार्यं विधाय च।
मच्चित्ते महती चिन्ता तां श्रुत्वा सुखमावह॥ ५५
उद्धवजी बोले—गोविन्द! अब आप तो अपने भक्तोंका कार्य करके परमधामको पधारना चाहते हैं; किन्तु मेरे मनमें एक बड़ी चिन्ता है। उसे सुनकर आप मुझे शान्त कीजिये॥ ५५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण PRE.3.55 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 51) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/mahatmya/padma/3/55/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)