ब्राह्मणने कहा—महाराज! मैं अपने पूर्वजन्मके पापोंसे संचित दुःखका क्या वर्णन करूँ? अब मेरे पितर मेरे द्वारा दी हुई जलांजलिके जलको अपनी चिन्ताजनित साँससे कुछ गरम करके पीते हैं॥ २७॥
किं ब्रवीमि ऋषे दुःखं पूर्वपापेन संचितम्।
मदीयाः पूर्वजास्तोयं कवोष्णमुपभुञ्जते॥ २७
ब्राह्मणने कहा—महाराज! मैं अपने पूर्वजन्मके पापोंसे संचित दुःखका क्या वर्णन करूँ? अब मेरे पितर मेरे द्वारा दी हुई जलांजलिके जलको अपनी चिन्ताजनित साँससे कुछ गरम करके पीते हैं॥ २७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण PRE.4.27 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 56) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/mahatmya/padma/4/27/