दूसरोंकी चोरी करना और सब लोगोंसे द्वेष बढ़ाना उसका स्वभाव बन गया था। छिपे-छिपे वह दूसरोंके घरोंमें आग लगा देता था। दूसरोंके बालकोंको खेलानेके लिये गोदमें लेता और उन्हें चट कुएँमें डाल देता॥ ६८॥
चौरः सर्वजनद्वेषी परवेश्मप्रदीपकः।
लालनायार्भकान्धृत्वा सद्यः कूपे न्यपातयत्॥ ६८
दूसरोंकी चोरी करना और सब लोगोंसे द्वेष बढ़ाना उसका स्वभाव बन गया था। छिपे-छिपे वह दूसरोंके घरोंमें आग लगा देता था। दूसरोंके बालकोंको खेलानेके लिये गोदमें लेता और उन्हें चट कुएँमें डाल देता॥ ६८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण PRE.4.68 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 60) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/mahatmya/padma/4/68/