स्नान-शौचादि ब्राह्मणोचित आचारोंका उसमें नाम भी न था और न खान-पानका ही कोई परहेज था। क्रोध उसमें बहुत बढ़ा-चढ़ा था। वह बुरी-बुरी वस्तुओंका संग्रह किया करता था। मुर्देके हाथसे छुआया हुआ अन्न भी खा लेता था॥ ६७॥
स्नानशौचक्रियाहीनो दुर्भक्षी क्रोधवर्धितः।
दुष्परिग्रहकर्ता च शवहस्तेन भोजनम्॥ ६७
स्नान-शौचादि ब्राह्मणोचित आचारोंका उसमें नाम भी न था और न खान-पानका ही कोई परहेज था। क्रोध उसमें बहुत बढ़ा-चढ़ा था। वह बुरी-बुरी वस्तुओंका संग्रह किया करता था। मुर्देके हाथसे छुआया हुआ अन्न भी खा लेता था॥ ६७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण PRE.4.67 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 60) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/mahatmya/padma/4/67/