श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक PRE.4.78

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (पद्मपुराण) · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

अन्धकूपे स्नेहपाशे बद्धः पङ्गुरहं शठः।

कर्मणा पतितो नूनं मामुद्धर दयानिधे॥ ७८

andhakūpe snehapāśe baddhaḥ paṅgurahaṃ śaṭhaḥ|

karmaṇā patito nūnaṃ māmuddhara dayānidhe|| 78

अर्थ

मैं बड़ा मूर्ख हूँ, अबतक कर्मवश स्नेहपाशमें बँधा हुआ अपंगकी भाँति इस घररूप अँधेरे कुएँमें ही पड़ा रहा हूँ। तुम बड़े दयालु हो, इससे मेरा उद्धार करो’॥ ७८॥

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