॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक PRE.4.78
अन्धकूपे स्नेहपाशे बद्धः पङ्गुरहं शठः।
कर्मणा पतितो नूनं मामुद्धर दयानिधे॥ ७८
andhakūpe snehapāśe baddhaḥ paṅgurahaṃ śaṭhaḥ|
karmaṇā patito nūnaṃ māmuddhara dayānidhe|| 78
अर्थ
मैं बड़ा मूर्ख हूँ, अबतक कर्मवश स्नेहपाशमें बँधा हुआ अपंगकी भाँति इस घररूप अँधेरे कुएँमें ही पड़ा रहा हूँ। तुम बड़े दयालु हो, इससे मेरा उद्धार करो’॥ ७८॥