श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक PRE.4.79

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (पद्मपुराण) · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

गोकर्ण उवाच

देहेऽस्थिमांसरुधिरेऽभिमतिं त्यज त्वं जायासुतादिषु सदा ममतां विमुञ्च।

पश्यानिशं जगदिदं क्षणभङ्गनिष्ठं वैराग्यरागरसिको भव भक्तिनिष्ठः॥ ७९

dehe'sthimāṃsarudhire'bhimatiṃ tyaja tvaṃ jāyāsutādiṣu sadā mamatāṃ vimuñca|

paśyāniśaṃ jagadidaṃ kṣaṇabhaṅganiṣṭhaṃ vairāgyarāgarasiko bhava bhaktiniṣṭhaḥ|| 79

अर्थ

गोकर्णने कहा—पिताजी! यह शरीर हड्डी, मांस और रुधिरका पिण्ड है; इसे आप ‘मैं’ मानना छोड़ दें और स्त्री-पुत्रादिको ‘अपना’ कभी न मानें। इस संसारको रात-दिन क्षणभंगुर देखें, इसकी किसी भी वस्तुको स्थायी समझकर उसमें राग न करें। बस, एकमात्र वैराग्यरसके रसिक होकर भगवान्‌की भक्तिमें लगे रहें॥ ७९॥✎ 13 14

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #13 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #14 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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