श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक PRE.4.80

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (पद्मपुराण) · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

धर्मं भजस्व सततं त्यज लोकधर्मान् सेवस्व साधुपुरुषाञ्जहि कामतृष्णाम्।

अन्यस्य दोषगुणचिन्तनमाशु मुक्‍त्वा सेवाकथारसमहो नितरां पिब त्वम्॥ ८०

dharmaṃ bhajasva satataṃ tyaja lokadharmān sevasva sādhupuruṣāñjahi kāmatṛṣṇām|

anyasya doṣaguṇacintanamāśu muktvā sevākathārasamaho nitarāṃ piba tvam|| 80

अर्थ

भगवद्भजन ही सबसे बड़ा धर्म है, निरन्तर उसीका आश्रय लिये रहें। अन्य सब प्रकारके लौकिक धर्मोंसे मुख मोड़ लें। सदा साधुजनोंकी सेवा करें। भोगोंकी लालसाको पास न फटकने दें तथा जल्दी-से-जल्दी दूसरोंके गुण-दोषोंका विचार करना छोड़कर एकमात्र भगवत्सेवा और भगवान्‌की कथाओंके रसका ही पान करें॥ ८०॥✎ 13 14

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #13 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #14 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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