श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक PRE.5.20

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (पद्मपुराण) · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

एवं भ्रमन् स गोकर्णः स्वपुरं समुपेयिवान्।

रात्रौ गृहाङ्गणे स्वप्तुमागतोऽलक्षितः परैः॥ २०

evaṃ bhraman sa gokarṇaḥ svapuraṃ samupeyivān|

rātrau gṛhāṅgaṇe svaptumāgato'lakṣitaḥ paraiḥ|| 20

अर्थ

इस प्रकार घूमते-घूमते गोकर्णजी अपने नगरमें आये और रात्रिके समय दूसरोंकी दृष्टिसे बचकर सीधे अपने घरके आँगनमें सोनेके लिये पहुँचे॥ २०॥

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