श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक PRE.5.22

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (पद्मपुराण) · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

सकृन्मेषः सकृद्धस्ती सकृच्च महिषोऽभवत्।

सकृदिन्द्रः सकृच्चाग्‍निः पुनश्‍च पुरुषोऽभवत्॥ २२

sakṛnmeṣaḥ sakṛddhastī sakṛcca mahiṣo'bhavat|

sakṛdindraḥ sakṛccāgniḥ punaśca puruṣo'bhavat|| 22

अर्थ

वह कभी भेड़ा, कभी हाथी, कभी भैंसा, कभी इन्द्र और कभी अग्‍निका रूप धारण करता। अन्तमें वह मनुष्यके आकारमें प्रकट हुआ॥ २२॥

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