श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक PRE.5.3

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (पद्मपुराण) · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

गोकर्णस्तीर्थयात्रार्थं निर्गतो योगसंस्थितः।

न दुःखं न सुखं तस्य न वैरी नापि बान्धवः॥ ३

gokarṇastīrthayātrārthaṃ nirgato yogasaṃsthitaḥ|

na duḥkhaṃ na sukhaṃ tasya na vairī nāpi bāndhavaḥ|| 3

अर्थ

योगनिष्ठ गोकर्णजी तीर्थयात्राके लिये निकल गये। उन्हें इन घटनाओंसे कोई सुख या दुःख नहीं होता था; क्योंकि उनका न कोई मित्र था न शत्रु॥ ३॥

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