॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक PRE.6.27
संसारसागरे मग्नं दीनं मां करुणानिधे।
कर्ममोहगृहीताङ्गं मामुद्धर भवार्णवात्॥ २७
saṃsārasāgare magnaṃ dīnaṃ māṃ karuṇānidhe|
karmamohagṛhītāṅgaṃ māmuddhara bhavārṇavāt|| 27
अर्थ
‘करुणानिधान! मैं संसारसागरमें डूबा हुआ और बड़ा दीन हूँ। कर्मोंके मोहरूपी ग्राहने मुझे पकड़ रखा है। आप इस संसारसागरसे मेरा उद्धार कीजिये’॥ २७॥ इसके पश्चात् धूप-दीप आदि सामग्रियोंसे श्रीमद्भागवतकी भी बड़े उत्साह और प्रीतिपूर्वक विधि-विधानसे पूजा करे॥ २८॥ फिर पुस्तकके आगे नारियल रखकर नमस्कार करे और प्रसन्नचित्तसे इस प्रकार स्तुति करे—॥ २९॥ ‘श्रीमद्भागवतके रूपमें आप साक्षात् श्रीकृष्णचन्द्र ही विराजमान हैं। नाथ! मैंने भवसागरसे छुटकारा पानेके लिये आपकी शरण ली है॥ ३०॥ मेरा यह मनोरथ आप बिना किसी विघ्न-बाधाके सांगोपांग पूरा करें। केशव! मैं आपका दास हूँ’॥ ३१॥