श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक PRE.6.37

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (पद्मपुराण) · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

लोकवित्तधनागारपुत्रचिन्तां व्युदस्य च।

कथाचित्तः शुद्धमतिः स लभेत्फलमुत्तमम्॥ ३७

lokavittadhanāgāraputracintāṃ vyudasya ca|

kathācittaḥ śuddhamatiḥ sa labhetphalamuttamam|| 37

अर्थ

जो पुरुष लोक, सम्पत्ति, धन, घर और पुत्रादिकी चिन्ता छोड़कर शुद्धचित्तसे केवल कथामें ही ध्यान रखता है, उसे इसके श्रवणका उत्तम फल मिलता है॥ ३७॥✎ 1570

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1570 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: प्रसन्‍नता-पूर्वक → प्रसन्‍नतापूर्वक

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