कथाके समय मल-मूत्रके वेगको काबूमें रखनेके लिये अल्पाहार सुखकारी होता है; इसलिये श्रोता केवल एक ही समय हविष्यान्न भोजन करे॥ ४०॥
मलमूत्रजयार्थं हि लघ्वाहारः सुखावहः।
हविष्यान्नेन कर्तव्यो ह्येकवारं कथार्थिना॥ ४०
कथाके समय मल-मूत्रके वेगको काबूमें रखनेके लिये अल्पाहार सुखकारी होता है; इसलिये श्रोता केवल एक ही समय हविष्यान्न भोजन करे॥ ४०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण PRE.6.40 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 74) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/mahatmya/padma/6/40/