श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक PRE.6.81

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (पद्मपुराण) · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

धर्मः प्रोज्झितकैतवोऽत्र परमो निर्मत्सराणां सतां

वेद्यं वास्तवमत्र वस्तु शिवदं तापत्रयोन्मूलनम् ।

श्रीमद्भागवते महामुनिकृते किं वा परैरीश्‍वरः

सद्यो हृद्यवरुध्यतेऽत्र कृतिभिः शुश्रूषुभिस्तत्क्षणात् ॥ ८१

dharmaḥ projjhitakaitavo'tra paramo nirmatsarāṇāṃ satāṃ

vedyaṃ vāstavamatra vastu śivadaṃ tāpatrayonmūlanam |

śrīmadbhāgavate mahāmunikṛte kiṃ vā parairīśvaraḥ

sadyo hṛdyavarudhyate'tra kṛtibhiḥ śuśrūṣubhistatkṣaṇāt || 81

अर्थ

महामुनि व्यासदेवने श्रीमद्भागवतमहापुराणकी रचना की है। इसमें निष्कपट—निष्काम परम धर्मका निरूपण है। इसमें शुद्धान्तःकरण सत्पुरुषोंके जानने-योग्य कल्याणकारी वास्तविक वस्तुका वर्णन है, जिससे तीनों तापोंकी शान्ति होती है। इसका आश्रय लेनेपर दूसरे शास्त्र अथवा साधनकी आवश्यकता नहीं रहती। जब कभी पुण्यात्मा पुरुष इसके श्रवणकी इच्छा करते हैं, तभी ईश्‍वर अविलम्ब उनके हृदयमें अवरुद्ध हो जाता है॥ ८१॥✎ 1273

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1273 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): श्रीमद्भागवत-महापुराणकी → श्रीमद्भागवतमहापुराणकी

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