॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक PRE.6.82
श्रीमद्भागवतं पुराणतिलकं यद्वैष्णवानां धनं
यस्मिन् पारमहंस्यमेवममलं ज्ञानं परं गीयते।
यत्र ज्ञानविरागभक्तिसहितं नैष्कर्म्यमाविष्कृतं
तच्छृण्वन् प्रपठन् विचारणपरो भक्त्या विमुच्येन्नरः॥ ८२
śrīmadbhāgavataṃ purāṇatilakaṃ yadvaiṣṇavānāṃ dhanaṃ
yasmin pāramahaṃsyamevamamalaṃ jñānaṃ paraṃ gīyate|
yatra jñānavirāgabhaktisahitaṃ naiṣkarmyamāviṣkṛtaṃ
tacchṛṇvan prapaṭhan vicāraṇaparo bhaktyā vimucyennaraḥ|| 82
अर्थ
यह भागवत पुराणोंका तिलक और वैष्णवोंका धन है। इसमें परमहंसोंके प्राप्य विशुद्ध ज्ञानका ही वर्णन किया गया है; तथा ज्ञान, वैराग्य और भक्तिके सहित निवृत्तिमार्गको प्रकाशित किया गया है। जो पुरुष भक्तिपूर्वक इसके श्रवण, पठन और मननमें तत्पर रहता है, वह मुक्त हो जाता है॥ ८२॥✎ 1273