श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक PRE.6.87

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (पद्मपुराण) · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

ननर्त मध्ये त्रिकमेव तत्र भक्‍त्यादिकानां नटवत्सुतेजसाम्।

अलौकिकं कीर्तनमेतदीक्ष्य हरिः प्रसन्‍नोऽपि वचोऽब्रवीत्तत्॥ ८७

nanarta madhye trikameva tatra bhaktyādikānāṃ naṭavatsutejasām|

alaukikaṃ kīrtanametadīkṣya hariḥ prasanno'pi vaco'bravīttat|| 87

अर्थ

इन सबके बीचमें परम तेजस्वी भक्ति, ज्ञान और वैराग्य नटोंके समान नाचने लगे। ऐसा अलौकिक कीर्तन देखकर भगवान् प्रसन्‍न हो गये और इस प्रकार कहने लगे—॥ ८७॥

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