श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक PRE.6.86

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (पद्मपुराण) · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

प्रह्रादस्तालधारी तरलगतितया चोद्धवः कांस्यधारी✎ 985

वीणाधारी सुरर्षिः स्वरकुशलतया रागकर्तार्जुनोऽभूत् ।

इन्द्रोऽवादीन्मृदङ्गं जयजयसुकराः कीर्तने ते कुमारा

यत्राग्रे भाववक्ता सरसरचनया व्यासपुत्रो बभूव॥ ८६

prahrādastāladhārī taralagatitayā coddhavaḥ kāṃsyadhārī

vīṇādhārī surarṣiḥ svarakuśalatayā rāgakartārjuno'bhūt |

indro'vādīnmṛdaṅgaṃ jayajayasukarāḥ kīrtane te kumārā

yatrāgre bhāvavaktā sarasaracanayā vyāsaputro babhūva|| 86

अर्थ

कीर्तन आरम्भ हुआ। प्रह्लादजी तो चंचलगति (फुर्तीले) होनेके कारण करताल बजाने लगे, उद्धवजीने झाँझें उठा लीं, देवर्षि नारद वीणाकी ध्वनि करने लगे, स्वर-विज्ञान (गान-विद्या)-में कुशल होनेके कारण अर्जुन राग अलापने लगे, इन्द्रने मृदंग बजाना आरम्भ किया, सनकादि बीच-बीचमें जयघोष करने लगे और इन सबके आगे शुकदेवजी तरह-तरहकी सरस अंगभंगी करके भाव बताने लगे॥ ८६॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #985 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): प्रहृदस्तालधारी → प्रह्रादस्तालधारी

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