श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक PRE.6.85

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (पद्मपुराण) · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

दृष्ट्वा प्रसन्‍नं महदासने हरिं ते चक्रिरे कीर्तनमग्रतस्तदा।

भवो भवान्या कमलासनस्तु तत्रागमत्कीर्तनदर्शनाय ॥ ८५

dṛṣṭvā prasannaṃ mahadāsane hariṃ te cakrire kīrtanamagratastadā|

bhavo bhavānyā kamalāsanastu tatrāgamatkīrtanadarśanāya || 85

अर्थ

भगवान्‌को प्रसन्‍न देखकर देवर्षिने उन्हें एक विशाल सिंहासनपर बैठा दिया और सब लोग उनके सामने संकीर्तन करने लगे। उस कीर्तनको देखनेके लिये श्रीपार्वतीजीके सहित महादेवजी और ब्रह्माजी भी आये॥ ८५॥✎ 18 19

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #18 शब्दोंके बीचका स्थान: कोप्रसन्‍न → को प्रसन्‍न
  • #19 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

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