भगवान्को प्रसन्न देखकर देवर्षिने उन्हें एक विशाल सिंहासनपर बैठा दिया और सब लोग उनके सामने संकीर्तन करने लगे। उस कीर्तनको देखनेके लिये श्रीपार्वतीजीके सहित महादेवजी और ब्रह्माजी भी आये॥ ८५॥✎ 1819
दृष्ट्वा प्रसन्नं महदासने हरिं ते चक्रिरे कीर्तनमग्रतस्तदा।
भवो भवान्या कमलासनस्तु तत्रागमत्कीर्तनदर्शनाय ॥ ८५
भगवान्को प्रसन्न देखकर देवर्षिने उन्हें एक विशाल सिंहासनपर बैठा दिया और सब लोग उनके सामने संकीर्तन करने लगे। उस कीर्तनको देखनेके लिये श्रीपार्वतीजीके सहित महादेवजी और ब्रह्माजी भी आये॥ ८५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण PRE.6.85 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 78) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/mahatmya/padma/6/85/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
#18 शब्दोंके बीचका स्थान: कोप्रसन्न → को प्रसन्न