नैमिषारण्यक्षेत्रमें श्रीसूतजी स्वस्थ चित्तसे अपने आसनपर बैठे हुए थे। उस समय भगवान्की अमृतमयी लीलाकथाके रसिक, उसके रसास्वादनमें अत्यन्त कुशल शौनकादि ऋषियोंने सूतजीको प्रणाम करके उनसे यह प्रश्न किया॥ २॥
नैमिषे सूतमासीनमभिवाद्य महामतिम्।
कथामृतरसास्वादकुशला ऋषयोऽब्रुवन्॥ २
नैमिषारण्यक्षेत्रमें श्रीसूतजी स्वस्थ चित्तसे अपने आसनपर बैठे हुए थे। उस समय भगवान्की अमृतमयी लीलाकथाके रसिक, उसके रसास्वादनमें अत्यन्त कुशल शौनकादि ऋषियोंने सूतजीको प्रणाम करके उनसे यह प्रश्न किया॥ २॥
श्रीमद्भागवत महापुराण POST.1.2 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 983) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/mahatmya/skanda/1/2/