tato rahasyametasmāt prāpsyasi tvaṃ samātṛkaḥ|| 41
अर्थ
वज्रनाभ! इस व्रजभूमिका सेवन करते रहनेसे तुम्हें किसी दिन उद्धवजी मिल जायँगे। फिर तो अपनी माताओंसहित तुम उन्हींसे इस भूमिका तथा भगवान्की लीलाका रहस्य भी जान लोगे॥ ४१॥
वज्र संसेवनादस्य उद्धवस्त्वां मिलिष्यति।
ततो रहस्यमेतस्मात् प्राप्स्यसि त्वं समातृकः॥ ४१
वज्रनाभ! इस व्रजभूमिका सेवन करते रहनेसे तुम्हें किसी दिन उद्धवजी मिल जायँगे। फिर तो अपनी माताओंसहित तुम उन्हींसे इस भूमिका तथा भगवान्की लीलाका रहस्य भी जान लोगे॥ ४१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण POST.1.41 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 988) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/mahatmya/skanda/1/41/