उनका प्रश्न सुनकर यमुनाजी हँस पड़ीं। साथ ही यह सोचकर कि मेरे प्रियतमकी पत्नी होनेके कारण ये भी मेरी ही बहिनें हैं, पिघल गयीं; उनका हृदय दयासे द्रवित हो उठा। अतः वे इस प्रकार कहने लगीं॥ १०॥
तच्छ्रुत्वा स्मयमाना सा कालिन्दी वाक्यमब्रवीत्।
सापत्न्यं वीक्ष्य तत्तासां करुणापरमानसा॥ १०
उनका प्रश्न सुनकर यमुनाजी हँस पड़ीं। साथ ही यह सोचकर कि मेरे प्रियतमकी पत्नी होनेके कारण ये भी मेरी ही बहिनें हैं, पिघल गयीं; उनका हृदय दयासे द्रवित हो उठा। अतः वे इस प्रकार कहने लगीं॥ १०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण POST.2.10 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 990) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/mahatmya/skanda/2/10/