श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक POST.2.11

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (स्कन्दपुराण) · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

कालिन्द्युवाच

आत्मारामस्य कृष्णस्य ध्रुवमात्मास्ति राधिका।

तस्या दास्यप्रभावेण विरहोऽस्मान् न संस्पृशेत्॥ ११

ātmārāmasya kṛṣṇasya dhruvamātmāsti rādhikā|

tasyā dāsyaprabhāveṇa viraho'smān na saṃspṛśet|| 11

अर्थ

यमुनाजीने कहा—अपनी आत्मामें ही रमण करनेके कारण भगवान् श्रीकृष्ण आत्माराम हैं और उनकी आत्मा हैं—श्रीराधाजी। मैं दासीकी भाँति राधाजीकी सेवा करती रहती हूँ; उनकी सेवाका ही यह प्रभाव है कि विरह हमारा स्पर्श नहीं कर सकता॥ ११॥

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