tasyā dāsyaprabhāveṇa viraho'smān na saṃspṛśet|| 11
अर्थ
यमुनाजीने कहा—अपनी आत्मामें ही रमण करनेके कारण भगवान् श्रीकृष्ण आत्माराम हैं और उनकी आत्मा हैं—श्रीराधाजी। मैं दासीकी भाँति राधाजीकी सेवा करती रहती हूँ; उनकी सेवाका ही यह प्रभाव है कि विरह हमारा स्पर्श नहीं कर सकता॥ ११॥
आत्मारामस्य कृष्णस्य ध्रुवमात्मास्ति राधिका।
तस्या दास्यप्रभावेण विरहोऽस्मान् न संस्पृशेत्॥ ११
यमुनाजीने कहा—अपनी आत्मामें ही रमण करनेके कारण भगवान् श्रीकृष्ण आत्माराम हैं और उनकी आत्मा हैं—श्रीराधाजी। मैं दासीकी भाँति राधाजीकी सेवा करती रहती हूँ; उनकी सेवाका ही यह प्रभाव है कि विरह हमारा स्पर्श नहीं कर सकता॥ ११॥
श्रीमद्भागवत महापुराण POST.2.11 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 990) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/mahatmya/skanda/2/11/