उस उपदेशसे विष्णुभगवान्का चित्त प्रसन्न हो गया और वे लक्ष्मीजीके साथ प्रत्येक मासमें श्रीमद्भागवतका चिन्तन करने लगे। इससे वे परमार्थका पालन और यथार्थरूपसे संसारकी रक्षा करनेमें समर्थ हुए॥ ३४॥
ततो विष्णुः प्रसन्नात्मा परमार्थकपालने।
समर्थोऽभूच्छ्रिया मासि मासि भागवतं स्मरन्॥ ३४
उस उपदेशसे विष्णुभगवान्का चित्त प्रसन्न हो गया और वे लक्ष्मीजीके साथ प्रत्येक मासमें श्रीमद्भागवतका चिन्तन करने लगे। इससे वे परमार्थका पालन और यथार्थरूपसे संसारकी रक्षा करनेमें समर्थ हुए॥ ३४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण POST.3.34 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 997) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/mahatmya/skanda/3/34/