॥ श्रीहरिः ॥
तावतैव बभूवाहं कृष्णस्य दयितः सखा।
कृष्णेनाथ नियुक्तोऽहं व्रजे स्वप्रेयसीगणे॥ ४५
tāvataiva babhūvāhaṃ kṛṣṇasya dayitaḥ sakhā|
kṛṣṇenātha niyukto'haṃ vraje svapreyasīgaṇe|| 45
अर्थ
उतनेसे ही मैं भगवान् श्रीकृष्णका प्रियतम सखा हो गया। इसके पश्चात् भगवान्ने मुझे व्रजमें अपनी प्रियतमा गोपियोंकी सेवामें नियुक्त किया॥ ४५॥
तावतैव बभूवाहं कृष्णस्य दयितः सखा।
कृष्णेनाथ नियुक्तोऽहं व्रजे स्वप्रेयसीगणे॥ ४५
उतनेसे ही मैं भगवान् श्रीकृष्णका प्रियतम सखा हो गया। इसके पश्चात् भगवान्ने मुझे व्रजमें अपनी प्रियतमा गोपियोंकी सेवामें नियुक्त किया॥ ४५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण POST.3.45 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 998) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/mahatmya/skanda/3/45/