श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक POST.3.6

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (स्कन्दपुराण) · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

कृष्णचन्द्रः सदा पूर्णस्तस्य षोडश याः कलाः।

चित्सहस्रप्रभाभिन्‍ना अत्रास्ते तत्स्वरूपता॥ ६

kṛṣṇacandraḥ sadā pūrṇastasya ṣoḍaśa yāḥ kalāḥ|

citsahasraprabhābhinnā atrāste tatsvarūpatā|| 6

अर्थ

श्रीकृष्णचन्द्र नित्य परिपूर्ण हैं, प्राकृत चन्द्रमाकी भाँति उनमें वृद्धि और क्षयरूप विकार नहीं होते। उनकी जो सोलह कलाएँ हैं, उनसे सहस्रों चिन्मय किरणें निकलती रहती हैं; इससे उनके सहस्रों भेद हो जाते हैं। इन सभी कलाओंसे युक्त, नित्य परिपूर्ण श्रीकृष्ण इस व्रजभूमिमें सदा ही विद्यमान रहते हैं; इस भूमिमें और उनके स्वरूपमें कुछ अन्तर नहीं है॥ ६॥

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