श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक POST.4.14

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (स्कन्दपुराण) · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

शुकः सुष्ठु मितं वक्ति व्यासं श्रोतॄंश्‍च हर्षयन्।✎ 1254

सुपाठितः शुको यद्वच्छिक्षकं पार्श्‍वगानपि॥ १४

śukaḥ suṣṭhu mitaṃ vakti vyāsaṃ śrotṝṃśca harṣayan|

supāṭhitaḥ śuko yadvacchikṣakaṃ pārśvagānapi|| 14

अर्थ

जिस प्रकार भलीभाँति पढ़ाया हुआ तोता अपनी मधुर वाणीसे शिक्षकको तथा पास आनेवाले दूसरे लोगोंको भी प्रसन्‍न करता है, उसी प्रकार जो श्रोता कथावाचक व्यासके मुँहसे उपदेश सुनकर उसे सुन्दर और परिमित वाणीमें पुनः सुना देता और व्यास एवं अन्यान्य श्रोताओंको अत्यन्त आनन्दित करता है, वह ‘शुक’ कहलाता है॥ १४॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1254 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): श्रोतृंश्‍च → श्रोतॄंश्‍च

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