॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक POST.4.25
सप्ताहं यज्ञवद् यत्तु सश्रमं सत्वरं मुदा।
सेवितं राजसं तत्तु बहुपूजादिशोभनम्॥ २५
saptāhaṃ yajñavad yattu saśramaṃ satvaraṃ mudā|
sevitaṃ rājasaṃ tattu bahupūjādiśobhanam|| 25
अर्थ
जिसमें यज्ञकी भाँति तैयारी की गयी हो, बहुत-सी पूजा-सामग्रियोंके कारण जो अत्यन्त शोभासम्पन्न दिखायी दे रहा हो और बड़े ही परिश्रमसे बहुत उतावलीके साथ सात दिनोंमें ही जिसकी समाप्ति की जाय, वह प्रसन्नतापूर्वक किया हुआ श्रीमद्भागवतका सेवन ‘राजस’ है॥ २५॥