एक या दो महीनेमें धीरे-धीरे कथाके रसका आस्वादन करते हुए बिना परिश्रमके जो श्रवण होता है, वह पूर्ण आनन्दको बढ़ानेवाला ‘सात्त्विक’ सेवन कहलाता है॥ २६॥
मासेन ऋतुना वापि श्रवणं स्वादसंयुतम्।
सात्त्विकं यदनायासं समस्तानन्दवर्धनम्॥ २६
एक या दो महीनेमें धीरे-धीरे कथाके रसका आस्वादन करते हुए बिना परिश्रमके जो श्रवण होता है, वह पूर्ण आनन्दको बढ़ानेवाला ‘सात्त्विक’ सेवन कहलाता है॥ २६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण POST.4.26 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 1005) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/mahatmya/skanda/4/26/