॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक POST.4.8
मितबुद्ध्यादिवृत्तीनां मनुष्याणां हिताय च।
परीक्षिच्छुकसंवादो योऽसौ व्यासेन कीर्तितः॥ ८
mitabuddhyādivṛttīnāṃ manuṣyāṇāṃ hitāya ca|
parīkṣicchukasaṃvādo yo'sau vyāsena kīrtitaḥ|| 8
अर्थ
परन्तु जिनकी बुद्धि आदि वृत्तियाँ परिमित हैं, ऐसे मनुष्योंका हितसाधन करनेके लिये श्रीव्यासजीने परीक्षित् और शुकदेवजीके संवादके रूपमें जिसका गान किया है, उसीका नाम श्रीमद्भागवत है। उस ग्रन्थकी श्लोक-संख्या अठारह हजार है। इस भवसागरमें जो प्राणी कलिरूपी ग्राहसे ग्रस्त हो रहे हैं, उनके लिये वह श्रीमद्भागवत ही सर्वोत्तम सहारा है॥ ८-९॥