॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक POST.4.9
ग्रन्थोऽष्टादशसाहस्रो योऽसौ भागवताभिधः।
कलिग्राहगृहीतानां स एव परमाश्रयः॥ ९
grantho'ṣṭādaśasāhasro yo'sau bhāgavatābhidhaḥ|
kaligrāhagṛhītānāṃ sa eva paramāśrayaḥ|| 9
अर्थ
परन्तु जिनकी बुद्धि आदि वृत्तियाँ परिमित हैं, ऐसे मनुष्योंका हितसाधन करनेके लिये श्रीव्यासजीने परीक्षित् और शुकदेवजीके संवादके रूपमें जिसका गान किया है, उसीका नाम श्रीमद्भागवत है। उस ग्रन्थकी श्लोक-संख्या अठारह हजार है। इस भवसागरमें जो प्राणी कलिरूपी ग्राहसे ग्रस्त हो रहे हैं, उनके लिये वह श्रीमद्भागवत ही सर्वोत्तम सहारा है॥ ८-९॥