श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.10.21

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

स वै किलायं पुरुषः पुरातनो य एक आसीदविशेष आत्मनि।

अग्रे गुणेभ्यो जगदात्मनीश्‍वरे निमीलितात्मन्‍निशि सुप्तशक्तिषु॥ २१

sa vai kilāyaṃ puruṣaḥ purātano ya eka āsīdaviśeṣa ātmani|

agre guṇebhyo jagadātmanīśvare nimīlitātmanniśi suptaśaktiṣu|| 21

अर्थ

वे आपसमें कह रही थीं—‘सखियो! ये वे ही सनातन परम पुरुष हैं, जो प्रलयके समय भी अपने अद्वितीय निर्विशेष स्वरूपमें स्थित रहते हैं। उस समय सृष्टिके मूल ये तीनों गुण भी नहीं रहते। जगदात्मा ईश्‍वरमें जीव भी लीन हो जाते हैं और महत्तत्त्वादि समस्त शक्तियाँ अपने कारण अव्यक्तमें सो जाती हैं॥ २१॥

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