॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 1.10.4
कामं ववर्ष पर्जन्यः सर्वकामदुघा मही।
सिषिचुः स्म व्रजान् गावः पयसोधस्वतीर्मुदा॥ ४
kāmaṃ vavarṣa parjanyaḥ sarvakāmadughā mahī|
siṣicuḥ sma vrajān gāvaḥ payasodhasvatīrmudā|| 4
अर्थ
युधिष्ठिरके राज्यमें आवश्यकतानुसार यथेष्ट वर्षा होती थी, पृथ्वीमें समस्त अभीष्ट वस्तुएँ पैदा होती थीं, बड़े-बड़े थनोंवाली बहुत-सी गौएँ प्रसन्न रहकर गोशालाओंको दूधसे सींचती रहती थीं॥ ४॥ नदियाँ, समुद्र, पर्वत, वनस्पति, लताएँ और ओषधियाँ प्रत्येक ऋतुमें यथेष्टरूपसे अपनी-अपनी वस्तुएँ राजाको देती थीं॥ ५॥ अजातशत्रु महाराज युधिष्ठिरके राज्यमें किसी प्राणीको कभी भी आधि-व्याधि अथवा दैविक, भौतिक और आत्मिक क्लेश नहीं होते थे॥ ६॥