॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 1.11.33
यद्यप्यसौ पार्श्वगतो रहोगतस्तथापि तस्याङ्घ्रियुगं नवं नवम्।✎ 1524
पदे पदे का विरमेत तत्पदाच्चलापि यच्छ्रीर्न जहाति कर्हिचित्॥ ३३✎ 1525
yadyapyasau pārśvagato rahogatastathāpi tasyāṅghriyugaṃ navaṃ navam|
pade pade kā virameta tatpadāccalāpi yacchrīrna jahāti karhicit|| 33
अर्थ
यद्यपि भगवान् श्रीकृष्ण एकान्तमें सर्वदा ही उनके पास रहते थे, तथापि उनके चरण-कमल उन्हें पद-पदपर नये-नये जान पड़ते। भला, स्वभावसे ही चंचल लक्ष्मी जिन्हें एक क्षणके लिये भी कभी नहीं छोड़तीं, उनकी संनिधिसे किस स्त्रीकी तृप्ति हो सकती है॥ ३३॥