श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.11.34

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

एवं नृपाणां क्षितिभारजन्मनामक्षौहिणीभिः परिवृत्ततेजसाम्।✎ 1526

विधाय वैरं श्‍वसनो यथानलं मिथो वधेनोपरतो निरायुधः॥ ३४

evaṃ nṛpāṇāṃ kṣitibhārajanmanāmakṣauhiṇībhiḥ parivṛttatejasām|

vidhāya vairaṃ śvasano yathānalaṃ mitho vadhenoparato nirāyudhaḥ|| 34

अर्थ

जैसे वायु बाँसोंके संघर्षसे दावानल पैदा करके उन्हें जला देता है, वैसे ही पृथ्वीके भारभूत और शक्तिशाली राजाओंमें परस्पर फूट डालकर बिना शस्त्र ग्रहण किये ही भगवान् श्रीकृष्णने उन्हें कई अक्षौहिणी सेनासहित एक-दूसरेसे मरवा डाला और उसके बाद आप भी उपराम हो गये॥ ३४॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1526 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: क्षितिभारजन्मना- मक्षौहिणीभि: → क्षितिभारजन्मनामक्षौहिणीभिः

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