श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.11.37

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

तमयं मन्यते लोको ह्यसङ्गमपि सङ्गिनम्।

आत्मौपम्येन मनुजं व्यापृण्वानं यतोऽबुधः॥ ३७

tamayaṃ manyate loko hyasaṅgamapi saṅginam|

ātmaupamyena manujaṃ vyāpṛṇvānaṃ yato'budhaḥ|| 37

अर्थ

जिनकी निर्मल और मधुर हँसी उनके हृदयके उन्मुक्त भावोंको सूचित करनेवाली थी, जिनकी लजीली चितवनकी चोटसे बेसुध होकर विश्‍वविजयी कामदेवने भी अपने धनुषका परित्याग कर दिया था—वे कमनीय कामिनियाँ अपने काम-विलासोंसे जिनके मनमें तनिक भी क्षोभ नहीं पैदा कर सकीं, उन असंग भगवान् श्रीकृष्णको संसारके लोग अपने ही समान कर्म करते देखकर आसक्त मनुष्य समझते हैं—यह उनकी मूर्खता है॥ ३६-३७॥

यह अर्थ श्लोक 36–37 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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