na yujyate sadā''tmasthairyathā buddhistadāśrayā|| 38
अर्थ
यही तो भगवान्की भगवत्ता है कि वे प्रकृतिमें स्थित होकर भी उसके गुणोंसे कभी लिप्त नहीं होते, जैसे भगवान्की शरणागत बुद्धि अपनेमें रहनेवाले प्राकृत गुणोंसे लिप्त नहीं होती॥ ३८॥✎ 8384
एतदीशनमीशस्य प्रकृतिस्थोऽपि तद्गुणैः।
न युज्यते सदाऽऽत्मस्थैर्यथा बुद्धिस्तदाश्रया॥ ३८
यही तो भगवान्की भगवत्ता है कि वे प्रकृतिमें स्थित होकर भी उसके गुणोंसे कभी लिप्त नहीं होते, जैसे भगवान्की शरणागत बुद्धि अपनेमें रहनेवाले प्राकृत गुणोंसे लिप्त नहीं होती॥ ३८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.11.38 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 134) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/1/11/38/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)