श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.12.28

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

जिज्ञासितात्मयाथात्म्यो मुनेर्व्याससुतादसौ।

हित्वेदं नृप गङ्गायां यास्यत्यद्धाकुतोभयम्॥ २८

jijñāsitātmayāthātmyo munervyāsasutādasau|

hitvedaṃ nṛpa gaṅgāyāṃ yāsyatyaddhākutobhayam|| 28

अर्थ

राजन्! व्यासनन्दन शुकदेवजीसे यह आत्माके यथार्थ स्वरूपका ज्ञान प्राप्त करेगा और अन्तमें गंगातटपर अपने शरीरको त्यागकर निश्‍चय ही अभयपद प्राप्त करेगा॥ २८॥✎ 86

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #86 शब्दोंके बीचका स्थान: होगा॥१९॥ → होगा॥ १९॥

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