राजन्! व्यासनन्दन शुकदेवजीसे यह आत्माके यथार्थ स्वरूपका ज्ञान प्राप्त करेगा और अन्तमें गंगातटपर अपने शरीरको त्यागकर निश्चय ही अभयपद प्राप्त करेगा॥ २८॥✎ 86
जिज्ञासितात्मयाथात्म्यो मुनेर्व्याससुतादसौ।
हित्वेदं नृप गङ्गायां यास्यत्यद्धाकुतोभयम्॥ २८
राजन्! व्यासनन्दन शुकदेवजीसे यह आत्माके यथार्थ स्वरूपका ज्ञान प्राप्त करेगा और अन्तमें गंगातटपर अपने शरीरको त्यागकर निश्चय ही अभयपद प्राप्त करेगा॥ २८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.12.28 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 138) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/1/12/28/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)