श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.13.43

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

यन्मन्यसे ध्रुवं लोकमध्रुवं वा न चोभयम्।

सर्वथा न हि शोच्यास्ते स्नेहादन्यत्र मोहजात्॥ ४३      

yanmanyase dhruvaṃ lokamadhruvaṃ vā na cobhayam|

sarvathā na hi śocyāste snehādanyatra mohajāt|| 43

अर्थ

तुमलोगोंको जीवरूपसे नित्य मानो या देहरूपसे अनित्य अथवा जडरूपसे अनित्य और चेतनरूपसे नित्य अथवा शुद्धब्रह्मरूपमें नित्य-अनित्य कुछ भी न मानो—किसी भी अवस्थामें मोहजन्य आसक्तिके अतिरिक्त वे शोक करनेयोग्य नहीं हैं॥ ४३॥✎ 91

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #91 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें