kathaṃ tvanāthāḥ kṛpaṇā varteraṃste ca māṃ vinā|| 44
अर्थ
इसलिये धर्मराज! वे दीन-दुःखी चाचा-चाची असहाय अवस्थामें मेरे बिना कैसे रहेंगे, इस अज्ञानजन्य मनकी विकलताको छोड़ दो ॥ ४४॥✎ 91
तस्माज्जह्यङ्ग वैक्लव्यमज्ञानकृतमात्मनः।
कथं त्वनाथाः कृपणा वर्तेरंस्ते च मां विना॥ ४४
इसलिये धर्मराज! वे दीन-दुःखी चाचा-चाची असहाय अवस्थामें मेरे बिना कैसे रहेंगे, इस अज्ञानजन्य मनकी विकलताको छोड़ दो ॥ ४४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.13.44 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 144) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/1/13/44/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)