यह पांचभौतिक शरीर काल, कर्म और गुणोंके वशमें है। अजगरके मुँहमें पड़े हुए पुरुषके समान यह पराधीन शरीर दूसरोंकी रक्षा ही क्या कर सकता है॥ ४५॥✎ 91
कालकर्मगुणाधीनो देहोऽयं पाञ्चभौतिकः।
कथमन्यांस्तु गोपायेत्सर्पग्रस्तो यथा परम्॥ ४५
यह पांचभौतिक शरीर काल, कर्म और गुणोंके वशमें है। अजगरके मुँहमें पड़े हुए पुरुषके समान यह पराधीन शरीर दूसरोंकी रक्षा ही क्या कर सकता है॥ ४५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.13.45 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 144) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/1/13/45/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)