श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.13.50

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

धृतराष्ट्रः सह भ्रात्रा गान्धार्या च स्वभार्यया।

दक्षिणेन हिमवत ऋषीणामाश्रमं गतः॥ ५०

dhṛtarāṣṭraḥ saha bhrātrā gāndhāryā ca svabhāryayā|

dakṣiṇena himavata ṛṣīṇāmāśramaṃ gataḥ|| 50

अर्थ

धर्मराज! हिमालयके दक्षिण भागमें, जहाँ सप्तर्षियोंकी प्रसन्‍नताके लिये गंगाजीने अलग-अलग सात धाराओंके रूपमें अपनेको सात भागोंमें विभक्त कर दिया है, जिसे ‘सप्तस्रोत’ कहते हैं, वहीं ऋषियोंके आश्रमपर धृतराष्ट्र अपनी पत्‍नी गान्धारी और विदुरके साथ गये हैं॥ ५०-५१॥

यह व्याख्या श्लोक 1.13.50 से 1.13.51 तककी एक साथ है।

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें